ram narayan shukla

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अभी पता चला प्रो रामनारायण शुक्ल नहीं रहे। मेरे अध्यापक जनवादी सांस्कृतिक आंदोलन संगठन के हमसफर. जाने कितने मंचों से साथ साथ बोलने, अभिनय करने, गाने, नारे लगाने, बहस करने, पत्रिका निकालने और बेचने की यादें। 1974 से अब तक की जाने कितनी यादें। अभी कुछ ही दिन हुए बलिराज पांडेय के साथ उनके दर्शन किए थे। बहुत सहना पड़ा उन्हें, शुक्ल जी बहुत याद आएँगे आप

अवधेश प्रधान

पूर्व प्रोफ़ेसर, हिंदी विभाग (काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी), आलोचक, लेखक, साहित्यकार



पहली बार शुक्लजी का नाम मैंने सन् १९७७ में सुना था, जब सतीशचन्द्र कॉलेज में मेरी नियुक्ति हुई थी। वे वहां से काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में आ चुके थे, लेकिन कॉलेज ही नहीं, उस समय पूरे बलिया जिले में साहित्यिक, सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय रहने वाला शायद ही कोई व्यक्ति होगा, जो शुक्लजी को न जानता हो। अपनी अध्यापन शैली, वक्तृता और सामाजिक सक्रियता से बलिया में उन्होंने जो दुर्लभ ख्याति अर्जित की थी, वह किसी के लिए भी सुखद ईर्ष्या का कारण बन सकती था। शुक्ल जी से मेरा प्रत्यक्ष परिचय भी सतीशचन्द्र कॉलेज, बलिया में ही हुआ था, जब वे अपनी टीम के साथ 'गिरगिट' नाटक का मंचन करने वहां गये थे। हमने प्रेमचंद पर उनका एक व्याख्यान आयोजित कराया था। उनका यह वाक्य मुझे आज भी याद है - प्रेमचंद मार्क्सवादी नहीं थे, मार्क्सवाद के प्रति उनके मन में आकर्षण था। सन् १९८४ में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में आने के साथ ही शुक्ल जी से मेरी घनिष्ठता अस्सी की चाय के साथ बढ़ी और वे इतने आत्मीय हुए कि प्रायः हर रोज पूर्वाह्न १० बजे उनका मेरे अस्सी स्थित आवास पर आना अनिवार्य हो गया था। तब तक उनका राष्ट्रीय जनवादी सांस्कृतिक मोर्चा बिखर चुका था। उनके काशी हिंदू विश्वविद्यालय अध्यापक संघ के महासचिव पद की चमक भी धुंधली पड़ चुकी थी और उनके साथ काम करने वाले दर्जनों प्रतिभा संपन्न संस्कृति कर्मी इधर-उधर हो चुके थे। शुक्ल जी अकेले पड़ गये थे, लेकिन अकेलेपन की किसी पीड़ा के साथ नहीं। उनका संपूर्ण व्यक्तित्व मानों कह रहा हो- अब तक क्या किया/जीवन क्या जिया/दिया ज्यादा/लिया बहुत-बहुत कम/मर गया देश......। आंतरिक और बाह्य संघर्षों की जय-पराजय के साथ सन् १९८४ के बाद शुक्ल जी में यदि कुछ बचा रह गया था, तो वह था- उनका विराट अध्यापकीय व्यक्तित्व। संस्कृत साहित्य, पश्चिम के साहित्य से लेकर हिन्दी साहित्य के हर युग का वस्तुगत विश्लेषण जिस तार्किक ढंग से वे करते, वह किसी को चकित करने वाला होता। मुक्तिबोध और प्रेमचन्द के वे 'मास्टर' थे। जैसे ही उनकी कक्षा छूटती, बीस-पच्चीस विद्यार्थी उन्हें घेर लेते और विभाग स्थित कटहल के पेड़ के नीचे घंटों वाद-विवाद चलता। वे हिन्दी विभाग के सुकरात थे। छात्रों के लिए उनके निडर नेतृत्व में कभी सप्ताह भर विभाग में तालाबंदी तक हुई थी। उनका जीवन सकारात्मक संघर्ष की परिभाषा था। शुक्ल जी ने आलोचनात्मक लेखन बहुत कम किया है। लेखक के रूप में प्रसिद्धि पाने की उनके मन में रत्ती भर भी इच्छा नहीं थी। एक बेचैन करने वाला उनका बहुत बड़ा सपना था- समाज को कैसे बदला जाय। मुक्तिबोध और प्रेमचंद इसीलिए उन्हें सर्वाधिक प्रिय थे। मुक्तिबोध पर डा.रामविलास शर्मा के आरोपों का जवाब देते हुए उन्होंने अपनी पुस्तक 'जनवादी समझ और साहित्य' में लिखा है कि 'यदि मुक्तिबोध अस्तित्ववाद या रहस्यवाद के प्रबल आकर्षण से विद्ध होते तो अकेले में मुक्ति की तलाश करते, जन- संग- ऊष्मा और उनके लक्ष्य से तदाकार होने का सवाल ही न उठता। सच्चाई यह है कि मुक्तिबोध का मन जन शक्ति में घुलने- मिलने को छटपटाने लगता है और उसी से एकात्मक होने में मुक्ति का एहसास कराता है। उनकी कुछ रचनाओं में रहस्य-सी जटिलता और दुर्बोधता अवश्य दिखाई पड़ती है, पर यह उनकी विशिष्ट प्रतीक पद्धति और मध्यवर्गीय जटिल द्वन्द्वों के विधान के कारण है, न कि उनके रहस्यवादी होने के कारण और उनकी इस विशिष्टता को नजरअंदाज किया भी नहीं जा सकता, निश्चित रूप से मुक्तिबोध का यह कमजोर पक्ष है।' शुक्ल जी का मानना था कि मुक्तिबोध व्यक्तित्व के जनतंत्रीकरण और गुणात्मक विकास में विश्वास रखते थे। शुक्ल जी ने एक लेख में नामवर सिंह की 'दूसरी परंपरा की खोज' के अंतर्विरोधों की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया है तथा कबीर और तुलसी को लेकर शुक्ल-द्विवेदी विवाद पर अपनी कलम चलाई है। उनका मानना था कि 'प्रेमचंद की रचनात्मक संवेदना, उनके प्रेरक स्रोत और जनपक्षधरता तथा गांधी की संवेदना, प्रेरक स्रोत और पक्षधरता में बुनियादी फर्क है। प्रेमचंद के समन्वय, सुधार और आदर्शवाद को गांधीवाद ने थोड़ा और गहरा जरूर बनाया, पर उसे कायम रखने में वह सफल न हो सके। डा. रामनारायण शुक्ल शब्द और कर्म में विश्वास करते थे। उनकी पक्षधरता स्पष्ट थी। वे एक बहुत बड़े जन-बुद्धिजीवी थे। बनारस के बौद्धिक, राजनीतिक और सामाजिक हलके में उनकी स्वीकार्यता थी। उनसे मिलने का मतलब होता था किसी-न-किसी क्षेत्र का तर्कसंगत ज्ञान प्राप्त करना। बनारस में उन्होंने जन-जागरण के लिए चुनाव भी लड़ा था। अध्यापन के साथ अभिनय में उनकी गहरी रुचि थी। 'एक और द्रोणाचार्य' का उन्होंने कई बार मंचन कराया था और उसमें अपने अभिनय से हमें प्रभावित किया था। 'बाणभट्ट की आत्मकथा' के नाट्य रूपांतरण में भी हमने उनकी अभिनय-क्षमता को देखा है। मुक्तिबोध के ब्रह्मराक्षस की तरह अपनी मुक्ति वे ज्ञान-दान में मानते थे। कभी चंद्रकला त्रिपाठी के आग्रह पर उन्होंने लंका स्थित मेरे आवास पर 'अंधेरे में' कविता की कई दिनों तक विस्तृत व्याख्या की थी। पत्नी के बार-बार कहने के बावजूद उन्होंने अपने परिवार की कोई चिंता नहीं की। ब्रेन हैमरेज की खबर सुनकर अवधेश प्रधान और रामकली सराफ के साथ उनका समाचार जानने जब मैं अस्पताल गया, तो उन्होंने मुझसे यही सवाल किया कि पांडेजी, सतीशचन्द्र कॉलेज में मेरे बड़े बेटे की नौकरी हो जायेगी न? मेरे पास एक झूठा दिलासा देने के अलावा और कुछ भी नहीं था। उन्होंने अपने बेटे-बेटी के साथ भाई के बेटे-बेटी को साथ रखकर पढ़ाया-लिखाया, शादी-विवाह संपन्न कराया, लेकिन सबके बावजूद अंत-अंत तक उनका पारिवारिक जीवन संघर्षों में ही बीता। हाल के कई वर्षों से वे बिस्तर पर पड गये थे। उनकी पत्नी और मंझले बेटे ने उनकी खूब सेवा की। इसी ४ अप्रैल को अवधेश प्रधान, मैं और रामकली सराफ उनसे मिले थे। दरवाजे पर आहट पाकर उन्होंने शायद अपनी पत्नी से कहा था- कोई आया है। हम अन्दर गये। पत्नी ने परिचय कराया, हमारे प्रणाम के उत्तर में उन्होंने कहा-कल्याण हो, कल्याण हो। मैंने गौर किया कि उनकेे समूचे बायें अंग में कोई हरकत नहीं है, लेकिन उनका दिमाग सक्रिय था। दो माह पहले ही बड़े बेटे की मृत्यु से आहत उनकी पत्नी आंसू भरी आंखों से शुक्ल जी को देखे जा रही थीं - कहते हुए कि अब कितना सहा जाय!!

बलिराज पांडेय

पूर्व प्रोफ़ेसर, हिंदी विभाग (काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी), आलोचक, लेखक, साहित्यकार



बी एच यू, हिंदी विभाग की वैदुष्य परंपरा की महत्वपूर्ण कड़ी प्रो० राम नारायण शुक्ल का निधन हम सबको मर्माहत कर गया। भगवान उनकी आत्मा को शांति दें।- प्रो वशिष्ठ नारायण त्रिपाठी गुरूजी का जाना मर्माहत कर गया , वे मेरे शोध निर्देशक थे , एम. ए. में अध्ययन के दौरान उनकी जनवादी विचार-धारा का मेरे ऊपर प्रर्याप्त प्रभाव पड़ा था । इसी से प्रभावित हो कर मैंने अपना शोध विषय - साठोत्तरी हिंदी कविता में जनवादी चेतना, निर्धारित किया था, वैसे इसके पहले भी वे मेरे लिए अपरिचित नहीं थे, उन्होंने अपना शोध - कार्य मेरे पिताजी के निर्देशन में किया था। जनवाद के प्रति उनका समर्पण किसी जनून की हद तक था। जनवादी लेखक संघ तथा उसकी सांस्कृतिक इकाई के कार्यक्रमों में उनके साथ हम विद्यार्थी भी बढ़ - चढ़ कर हिस्सा लेते थे। आज जब यह सब याद आ रहा है तो मन बहुत दुःखी है मैं उन्हें अपने पूरे मन से श्रद्धासुमन अर्पित करता हूं।

नरेंद्र सिंह

प्राध्यापक, लेखक



ॐ शांति! भावपूर्ण श्रद्धांजलि! काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष एवं वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. राम नारायण शुक्ल जी का लंबी बीमारी के बाद निधन। जन्म 7 जून सन् 1941 को सोनभद्र (पूर्व मिर्जापुर) के ग्राम बेलाही मे हुआ। प्रारंभिक शिक्षा ग्राम मे ही संस्कृत से हुई तत्पश्चात आगे की शिक्षा प्राप्त करने हेतू काशी आने की ललक मे सर पर गठरी लिए घर पैदल ही लुसा के लिए निकल पड़े जहाँ से रेलगाड़ी द्वारा चुनार पहुंचे फिर बस यात्रा कर रामनगर पहुंचकर स्टिमर से गंगा को पार कर काशी के असि घाट पर पहुँचे इस तरह आप प्रथम बार काशी पहुँचे। उस समय गरीबी ऐसी थी कि घर से अन्न तो मिल जाता था लेकिन उसको तैयार करने की प्रक्रिया मे जो धन लगता वो कैसे आये इसे लिए आप ऐसी जगह प्रवेश लेना चाहते थे जहाँ छात्रवृत्ति मिलती हो, उस समय वाराणसेय संस्कृत विद्यालय मे अध्ययन करने पर जो धन मिलता था उससे ही जीवन का गुजारा करना होता था, बाद मे काशी हिंदू विश्वविद्यालय से स्नातक, स्नातकोक्तर एवं शोध कार्य किये फिर तीन वर्ष बलिया मे अध्यापन करने के पश्चात काशी हिंदू विश्वविद्यालय मे 1974 से 2003 तक हिंदी विभाग मे अध्यापन का कार्य किया और विभागाध्यक्ष पद से सेवनिवृत हुए। प्रो. शुक्ल 'शिक्षक संघ' के महामंत्री एवं 'यूनिवर्सिटी कल्चरल' कमेटी के चेयरममैन भी रह चुके थे, यह कमेटी पूर्व कुलपति प्रो. आर. पी. रस्तोगी जी द्वारा बनाई गई थी। श्री शुक्ल जी के काल मे 'आल इंडिया यूथ फेस्टिवल' मे काशी हिंदू विश्वविद्यालय को प्रथम स्थान प्राप्त हुआ। श्री शुक्ल जी ने अपने अध्यापन और साहित्य यात्रा मे हिंदी साहित्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान दिया। आपने कई पुस्तके भी लिखी जैसे - रूप और वस्तु, वस्तुवादी परिपेक्ष्य व प्राचीन साहित्य, जनवादी समझ व साहित्य, 'भक्तिकाव्य' रूप व संवेदना, आपने हिंदी जगत के प्रसिद्ध पत्र पत्रिकाओं के लिए भी लेख लिखे। आप और आपका जीवन हमेशा युवा साहित्यकारों और साहित्य प्रेमियों के लिए प्रेरणा का कार्य करेगा।

हरि दर्शन सांख्य

प्रख्यात चित्रकार, रिसर्च स्कालर - फ़ाइन आर्ट्स (काशी हिंदी विश्वविद्यालय)



मेरे सखा (संजय) के सर्वस्व और मेरे आत्मीय गुरू का हमारे बीच न होना अविश्वसनीय है। नमन

प्रोफ़ेसर अनुराग यादव

वर्तमान प्रोफ़ेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष - हिंदी विभाग, काशी विद्यापीठ, वाराणसी



यह मृत्यु हमारी व्यक्तिगत क्षति है। रामनारायन शुक्ल जी वाम थे, पर समाजवादियो के लिए उनके अपने थे।

चंचल

छात्र नेता



काशी हिंदू विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रोफेसर राम नारायण शुक्ल जी का निधन। सबसे बड़ी बात छोटो को बहुत स्नेह देते थे खूब बैठकी करते थे विषय पर पकड़ के साथ अपनी बातों से मन मोह लेते थे। आपको शत शत नमन, विनम्र श्रद्धांजलि

राकेश मिश्रा

छात्र नेता



Bhu हिंदी विभाग के पूर्व विभाग प्रमुख रहे। अस्सी की बैठकी की पहचान प्रोफेसर राम नारायण शुक्ल जी के निधन पे अपनी शोकंजली अर्पित करता हूं

अशोक पांडेय

भारतीय जनता पार्टी



अभी अभी फेसबुक से ही ज्ञात हुआ कि गुरुवर प्रो रामनारायण शुक्ल जी नहीं रहे। ईधर लंबे समय से उनसे मिलना तो नहीं हुआ था लेकिन भाई शशांक जी के माध्यम से उनका समाचार मिलता रहता था। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के जिस हिंदी विभाग को विद्यार्थी के रूप में (1994-2000 तक) हमने देखा उसमें अनूठे व्यक्ति थे। केवल अध्ययन-अध्यापन में ही नही अपितु जीवनक्रम में उनकी एक सशक्त वैचारिकी थी। विद्यार्थियों के लिए सहज उपलब्ध उनका जीवन बड़ा ही अर्थवान था। एक सच्चे जनवादी शिक्षक, समाजसेवी, संस्कृतिकर्मी के रूप में वे हमेशा याद किए जाएंगे।

हितेंद्र मिश्र

प्रोफ़ेसर



जाने-माने लेखक और आलोचक प्रोफेसर रामनारायण शुक्ल की स्मृति को सलाम ज्ञात हुआ कि लेखक व आलोचक और बीएचयू के हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रोफ़ेसर रामनारायण शुक्ल नहीं रहे। प्रो रामनारायण शुक्ल लेखक व आलोचक के अतिरिक्त जनवादी आंदोलन के भी कर्ता धर्ता रहे हैं। पहले वे राष्ट्रीय जनवादी सांस्कृतिक मोर्चा से जुड़े थे। जब १९८५ में जन संस्कृति मंच की स्थापना हुई, वे इस के स्थापना सम्मेलन में शामिल हुए। मंच का जो अध्यक्ष मंडल चुना गया, उसमें गुरशरण सिंह अध्यक्ष बनाए गए। पांच उपाध्यक्षों में शुक्ल जी भी शामिल थे। १९८६ में मंच की उत्तर प्रदेश इकाई का पहला सम्मेलन इलाहाबाद विश्वविद्यालय के विज्ञान भवन में सम्पन्न हुआ था। शुक्ल जी उप्र इकाई के अध्यक्ष बनाए गए। हम उनके जनवादी आंदोलन के इस योगदान को याद करते हैं और अपनी ओर से और उत्तर प्रदेश की ओर से श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

कौशल किशोर

लेखक



यद्यपि यह सच है कि उन दिनों वार्षिक परीक्षा में मुक्तिबोध से सम्बंधित किसी प्रश्न का उत्तर देने मात्र से संस्कारी यानी दक्षिणपन्थी परीक्षक अज्ञात शिष्य को वामपंथी मानकर खराब नम्बर दे दिया करते थे, लेकिन इसके बावजूद वे मुक्तिबोध के प्रेम-रंग में इस प्रकार रंग देते थे कि वह रंग जीवन भर न उतरे। कक्षा के शैक्षिक व्याख्यनों में उनके मुख से एक अद्भुत अभिभूतकारी विचार-संगीत सा फूटता था। ऐसे अविस्मरणीय श्रद्धेय गुरुवर प्रोफेसर एवं पूर्व विभागाध्यक्ष रामनारायण शुक्ल जी के देहावसान की दुखद खबर Shashank Shukla से अभी-अभी मिली है। उनको हार्दिक श्रद्धांजलि।

रामप्रकाश कुशवाहा

अध्यापक, लेखक



वह प्रो. शुक्ल ही थे जिन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में हम सबको वैचारिक रूप से पुष्ट किया था। वह अपने शिष्यों साथियों में जीवित रहेंगे। सर को सादर नमन।

दिनेश कुशवाहा

कवि



यह समाचार सुनकर वाणी मौन है। कई दिनों से या कह लीजिए महीनों से गुरुदेव से मिलने की इच्छा हो रही थी परंतु नियत में यह भी नहीं लिखा था। वे दुर्लभ किस्म के गुरु थे। हमारे जीवन के सबसे लोकप्रिय गुरु। हमारे जैसे कितनों के सबसे लोकप्रिय गुरु। आज भी कक्षा में पढ़ाते समय प्रसंगवश गुरुदेव की चर्चा स्वाभाविक रूप से हो जाया करती है। ईश्वर गुरुदेव की आत्मा को शांति प्रदान करें। गुरुदेव को मेरी तरफ से भी विनम्र श्रद्धांजलि। ओम शांति ओम🌹🙏

संतोष यादव

शुक्ल जी के शिष्य



सदगुरु का ज्ञान प्रकाश अमर रहेगा - आकाशधर्मी श्रीगुरुवर को सादर नमन !

रामअवध यादव

शुक्ल जी के शिष्य



हम लोगों के गुरू होने के साथ दोस्ताना संबंध रखते थे। आपको विषय का गंभीर ज्ञान के साथ अध्यापन का अद्भुत कौशल था। जनवाद आपके लेखन के साथ व्यवहार में भी था। विचार और सिद्धान्त की चर्चा होगी तो सजीव मिलेंगे। सादर नमन।

चंद्रभान सिंह

अध्यापक



उन्होंने असंख्य लोगों को गढ़ा है। 80 से लेकर 87 तक हम सब उनके आसपास ही रहे। जो कुछ उनके साथ रहकर सीखा था बाद में वही हमारे काम आता रहा।

देवेंद्र

कहानीकार



सादर नमन। सबसे ज्यादा विभाग में उनके अपनों ने उन्हें प्रताड़ित किया, और अपमानित करने में कोताही नहीं की।

वशिष्ठ नारायण त्रिपाठी

प्रोफ़ेसर, हिंदी विभाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी



विनम्र श्रद्धांजलि। गुरदेव का जाना मेरे लिए एक युग का अंत है।

प्रो मनोज सिंह

प्रोफ़ेसर, हिंदी विभाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी (शुक्ल जी के शिष्य)



बी.ए. मे पढ़ाते समय जो दर्शन मन मे ठूस ठूस कर भरा वह इस तरह व्याप्त है कि इस जीवन मे उससे छुटकारा न मिल सकेगा। एम ए करते समय हर जगह बहस होती रही चाहे वह विभाग हो अथवा केशव के पान की दुकान। बहुत याद आओगे गुरूजी! ताउम्र. विनम्र श्रद्धांजलि

शोभनाथ गुप्ता

शुक्ल जी के शिष्य



डॉक्टर शुक्ल जी हमें एम. ए. की कक्षा में मुक्तिबोध की कविताएं पढ़ाते थे। पढ़ाते हुए वे डूब जाते थे कविताओं में। हमें भी कविता के मर्म का नैसर्गिक आनंद मिलता था। मेरे गुरुवार प्रो. त्रिभुवन सिंह द्वारा आयोजित 'भारतेंदु पुण्यशती' समायोजन में 'कवि दरबार' का आयोजन मालवीय भवन में किया गया था जिसमें शिवशंकर मिश्र ने भारतेंदु के किरदार को बड़े सुंदर ढंग से निभाया था और पूरे परिसर में मशहूर हो गए थे। मैंने स्वयं विद्यापति की भूमिका का निर्वाह किया था। बड़े भाई क्षमाशंकर पाण्डेय जयशंकर प्रसाद बने थे। दुर्गावती पांडेय ने सुभद्रा कुमारी चौहान की भूमिका निभाई थी। इस कवि दरबार में आदरणीय रामनारायण शुक्ल जी ने जनकवि धूमिल की भूमिका निभाई थी और उनके सुपुत्र अजय शुक्ला ने मुक्तिबोध की। अजय मुक्तिबोध के ड्रेस और कॉस्टयूम में मंच पर लगातार बीडी पिए जा रहे थे। इस पर दर्शक दीर्घा में बैठे तत्कालीन कुलपति डा.रघुनाथ प्रसाद रस्तोगी ने गुरुवर त्रिभुवन जी से पूछा,'ये बीडी क्यों पी रहे हैं? गुरुवर ने उन्हें बतलाया कि यही मुद्रा मुक्तिबोध की थी जिसे अजय रुपायित कर रहे हैं। कवि दरबार सुपर डुपर हिट रहा था जिसका संचालन प्रो. शिवप्रसाद सिंह और प्रो. शुकदेव सिंह कर रहे थे। ब्रह्मचारी भारत सिंह 'आजाद' ने कबीर को जिया था और आनंदनारायण पाण्डेय ने निराला को। शिवशंकर मिश्र ने भारतेंदु जी का गीत,'भोर भए जागे गिरिधारी' और 'नज़रहा छौंड़ा रे!नज़र लड़ा के चला जाय।' गाकर श्रोताओं को वशीभूत कर लिया था। प्रो. रामनारायण शुक्ल जी की कद काठी धूमिल की तरह की लंबी चौड़ी थी। बस लंबी सी मूंछ लगा दी गई थी और वे धूमिल का साकार स्वरूप लग रहे थे। कविता वाचन का अंदाज भी अनोखा! उन्होंने धूमिल को जीवंत कर दिया था और उनके बेटे ने मुक्तिबोध को। वे दिन भी कितने सुंदर थे। कल फेसबुक द्वारा मालूम हुआ कि शुक्लजी की मृत्यु के पूर्व ही अजय का भी निधन हो गया था। कल से ही अतीत के गुफा गहवर में अबाबिल की तरह भटक रहा हूं। पुराने दिनों की धुंधली यादें ज़हन में उभर कर परेशान कर रही हैं। है प्रभु!कितने निर्मम हो रहे हो तुम! ईश्वर पिता पुत्र की आत्मा को शांति प्रदान करें और उनके परिजनों/शिष्य मंडल को इस दारुण दुख को सह पाने की शक्ति! हरि ऊं!

अरुण कुमार

शुक्ल जी के शिष्य



सादर नमन! प्रोफेसर रामनारायण शुक्ल बनारस की साहित्यिक गतिविधियों में सक्रिय रहते हुए नये और युवा रचनाकारों को प्रोत्साहित करते रहते थे। उनमें बहुत प्रेम, निष्ठा और सादगी थी। अठत्तर से नब्बे तक उनसे संपर्क रहा। अक्सर वे याद आते थे। उन्हें भुलाया नहीं जा सकता। - केशव शरण, लेखक, बनारस आदरणीय गुरुवर प्रोफेसर रामनारायण शुक्ल जी मार्क्सवादी विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध थे। मुक्तिबोध को पढ़ाते समय उनकी इस प्रतिबद्धता की चमक और बढ़ जाती थी। कई बार वे एक अध्यापक के वजूद से अलग, एक चिंतक के रूप में विचारों की सैद्धांतिक ऊर्ध्वगामिता की ओर उन्मुख हो जाते थे। लेकिन यह मानना पड़ेगा कि वे जनवादी गतिविधियों को किसी न किसी रूप में सहयोग देने को हमेशा तत्पर रहते थे। उन दिनों, डॉ० श्रीकांत जी और डॉ० देवेन्द्र जी उनके सबसे निकट थे। डॉ० श्रीकांत जी ने बहुत पहले ही इस दुनिया को अलविदा कह दिया। डॉ० शुक्ल जी डिक्लास होने की बहुत चर्चा करते थे और नकलीपन की भर्त्सना किया करते थे। तब उनके व्यक्तित्व की आभा देखते ही बनती थी। प्रोफेसरी के अहम् से वे भरसक दूरी बनाकर रहते थे और विद्यार्थियों के निकट हो जाते थे। उनका जाना अत्यंत दुखद है। उन्हें विनम्रतापूर्वक नमन!

शिव कुमार पराग

लेखक, ग़ज़लकार



रामनारायण शुक्ल सर जो काशी हिंदू विश्वविद्यालय 'वाराणसी' हिंदी विभाग के एक प्रोफेसर थे। मैं प्रत्यक्षतः सर का छात्र कभी नहीं रहा कारण काशी हिंदू विश्वविद्यालय में मेरा प्रवेश 2016 में हुआ और शुक्ल सर तकरीबन 2003 में अपना कार्यकाल पूरा कर चुके थे। आज जब चारों तरफ से सिर्फ चीख और पुकार की ही खबरें आ रही हैं तब इसमें एक ख़बर यह भी है कि शुक्ल सर अब नहीं रहे। मैंने सर को कभी नही देखा, न कभी मिला और ना ही मिलने की कोशिश की! जिस बात का मलाल मुझे हमेशा रहेगा। आज जब उनके शिष्य औऱ उनसे कुछ सीखने वाले लोग संस्मरण और स्मृतियों के माध्यम से उन्हें उकेर रहे हैं तब मैं जान पाया कि वे कई विधाओं पर पकड़ रखने वाले एक बहुकोणीय अध्यापक थे। जो सिर्फ कक्षाओं में ही सक्रिय नही थे बल्कि प्रतिगामी चेतना के विरुद्ध सड़कों पर भी सक्रिय थे। हालाँकि मेरे पास भी उनकी एक किताब है जो कि मैंने पढ़ी है 'जनवादी समझ और साहित्य' जब मैं पढ़ रहा था तब मुझे नही पता था कि ये वही रामनारायण शुक्ल है जिन्होंने अपने समय में प्रगतिविरोधियों से लोहा लिया था। आज जब मैं अनेक संस्मरणों और स्मृतियों को पढ़ रहा हूँ तो एक गर्व की अनुभूति हो रही है। ऐसे क्रांतिधर्मी चेतना के प्रतीक 'रामनरायण शुक्ल' सर को आख़री सलाम! उस छात्र के तरफ से जिसने आपको सिर्फ किताबों के माध्यम से जाना और आपसे न मिल पाने की टीस उसे हमेशा कुरेदती रहेगी। सादर नमन

विक्रम झाँ जमाली

शोध छात्र, हिंदी



इस भयावहता के घेरे में फंसे हम सभी रोज़ रोज़ किसी के जाने की ख़बरें सुन रहे हैं। मृत्यु की घेरेबंदी मजबूत हो रही है। कुछ दिनों पहले अजय शुक्ल, स्मृति शेष रह गए, गुरुवर रामनारायण शुक्ल जी के बड़े बेटे की मृत्यु हो गई थी। प्रो शुक्ल कई सालों से बिस्तर पर थे। ब्रेन हैमरेज के बाद कोमा से बाहर तो आ गए थे मगर सक्रिय जीवन में लौट नहीं पाए। आदरणीया श्रीमती शुक्ल की सेवा ने उन्हें जिलाए रखा। लटपटाती वाणी में कुछ बातचीत भी करते रहे। कुछेक आत्मीयों को पहचानते भी रहे हमेशा। अचरज हुआ था जब उन्होंने हमें पहचान लिया। सच्चे अर्थ में मार्क्स वादी एक्टिविस्ट थे। सड़क के आदमी। आंदोलन की संस्कृति के रचयिता और विचारधारा के प्रति भी सचेत आलोचनात्मकता से लैस। हम जब रामविलास शर्मा जी की मुक्तिबोध की व्याख्या से लगभग विचलित से होते तो वे कहते कि शर्मा जी मार्क्सवादी ज़रुर हैं मगर दृष्टि की द्वंद्वात्मकता का अक्सर निर्वाह नहीं कर पाते। सृजनात्मकता की आलोचना में सौंदर्यबोधी मूल्यों के गहरे आकलन की संवेदनशीलता थी उनके पास। वे जीवन की गतिशीलता को रचने वाली रचनाओं के प्रशंसक थे साथ ही संस्कृत साहित्य और शास्त्र की भी बड़ी गहरी समझ थी उन्हें। इस तरह उनका आलोचकीय परिप्रेक्ष्य बहुत व्यापक था। शिवकुमार मिश्र के अति प्रिय हुए। वे रंगकर्म को सड़क से लेकर प्रेक्षागृह तक संभव करने वाले ऐसे शिक्षक जिसे अपने विद्यार्थियों से मित्रता ही सहज लगती थी। अनेक विद्यार्थियों से घिरे रहते। छल कपट से खाली थे और बेहद संवेदनशील थे। उनके प्रमोशन को हिंदी विभाग के अनेक उनके मित्र अध्यापकों ने भारी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष विरोध का मुद्दा बना लिया तो वे बहुत मर्माहत थे। इसे उन्होंने दिल पर ले लिया था। हम लोगों ने उनकी पीड़ा को बहुत निकट से देखा था। अकादमिक जगत इन संदर्भों में कितना बेरहम हो सकता है इसे हमने अनेक बार महसूस किया है। यह पीड़ा उनमें धंसती चली गई थी। सालों साल वह व्यक्ति उस चिंतन मनन और अभिव्यक्ति से छूटा रहा। उस संवाद और बहस से छूटा रहा जो उसका सब कुछ था। जीवन बस बिस्तर पर करवटों के अदलने बदलने में बचा था। हम स्तब्ध थे जब अजय की मृत्यु हो गई। अजय उनका बेटा ही नहीं साथी भी था। मुझे गुरुवर से जुड़े कितने ही प्रसंग याद आ रहे हैं। हम लोगों के दिमाग़ की खिड़कियां खोलने वाले जनपक्षधर मूल्यों की जीवंत व्याख्या करने वाले और मुक्तिबोध की कविता की पहचान कराने वाले वही तो थे। उनका होना एक आश्वस्ति था। वे बहसों को निमंत्रित करने वाले थे हमेशा। उनकी स्मृतियों को नमन करती हूं।

चन्द्रकला त्रिपाठी

प्रोफ़ेसर, हिंदी विभाग, महिला महाविद्यालय - काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी



वे जहां खड़े होते थे वहीं से सृजनशील और इंकलाबी युवाओं की कतार शुरू होती थी...वे हिंदी की दुनिया के चलते फिरते नुक्कड़ थे...नगाड़े थे..डफली थे...जनगीत थे...नाटक थे और उन सबका मिला जुला यूटोपिया पुरुष। वे एक योद्धा बुद्धिजीवी, लेखक और शिक्षक थे। बनारस और हिंदी की जन संस्कृति के एक पुराने स्तम्भ का गिरना नई पीढ़ी के लिए दुःखद है। प्रो रामनारायण शुक्ल ने कई साहित्यिक, सांस्कृतिक और एकेडमिक पीढ़ियों का निर्माण किया। वे न झुके, न टूटे; जीवन भर लड़ते रहे। विचारधारा और सौंदर्य चेतना के अनूठे व मौलिक आलोचक चिंतक तो थे ही लेखकों-बौद्धिकों की पूरी टीम उनके द्वारा खड़ी हुई। बनारस आने पर उनके साथ साल दो साल आदान प्रदान का तब मौका मिला जब वे मस्तिष्क आघात से उबरे थे। उन जैसा बड़े और खरे जनवादी बौद्धिक को आखिरी सलाम! काशी की आधुनिक हिंदी की शुतुर्मुगी बौद्धिकता के बीच आप जीवन भर जड़ता की लकड़ी चीरते रहे। आप हिंदी जगत पर कर्ज और उधार की तरह रहेंगे। आपका मूल्यांकन होना बाकी है। आपसे मिले थोड़े से स्नेह, आंखों से झरे आंसू और वे दफ्न संस्मरण बिना लिखे मैं काशी के मसान से मुक्त नगर में भटकता रहूंगा। जो चुप्पे हैं और जो बड़बोले; जो विचार के लिए आपके आसपास रहे और जो शुभ लाभ के लिए -दोनों अमरता की खोज में लाशों के ढेर पर धुओं की तरह नाच रहे हैं। दोनों ऑक्सीजन के दुश्मन हैं। भविष्य का समाज या तो जनता का होगा या बर्बरता का। आप अडिग रहे। आपको सलाम!

रामाज्ञा शशिधर

प्रोफ़ेसर, हिंदी विभाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी



शत शत नमन आदरणीय गुरुदेव प्रोफ़ेसर राम नारायण शुक्ल मेरे लिए तो पिता तुल्य रहें।

अरविंद शुक्ला

पूर्व उपाध्यक्ष, छात्र संघ, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी



हिन्दीजगत् की अपूरणीय क्षति । तत् सत् ।

डॉ राजेश्वर शास्त्री मुस्लगांवकर

ज्योतिष प्राध्यापक



गुरुदेव को नमन् अब 'जीते रहो' के साथ 'भविष्य अंधकारमय है इसलिए संघर्ष करो' की सीख कौन देगा।

विवेक जायसवाल

शुक्ल जी के शिष्य



वर्ष 1977 छात्र रहा हूं मैं गुरूदेव को कोटि-कोटि नमन विनम्र श्रद्धांजलि 🌹🙏 हिन्दीजगत् की अपूरणीय क्षति।

रमेश राय

शुक्ल जी के शिष्य



हम सब के प्रेरणाश्रोत, सोनभद्र के गौरव का निधन बहुत ही कष्टकारी है, बाबा विश्वनाथ से प्रार्थना है कि ऐसे पुण्य आत्मा को सद्गति प्रदान करें

डॉ जितेंद्र मिश्रा

प्रोफ़ेसर



सादर नमन, शुक्ला सर ने तो हम सब की प्रतिभा को उजागर किया, वे काफ़ी हंसमुख व्यक्ति थे, उनका जाना अत्यंत दुखद है।

रुक्मणि सिंह

शिष्य



हिन्दी विभाग के सभी छात्र छात्राओं से उनका व्यवहार मित्रवत था

भानु प्रताप सिंह

शिष्य



विश्वविद्यालय ने अपना एक बिद्वान खो दिया। विनम्र श्रद्धांजलि

अनिल कुमार

अध्यापक



दिवंगत आत्मा को विनम्र श्रद्धांजलि। शहर ने एक सम्मानित शिक्षक और महान हिंदी साहित्य प्रतिपादक खो दिया है। शोक संतप्त परिवार के प्रति हार्दिक संवेदना

वीरेंद्र मोहन गुप्ता

अध्यापक



हम दोनों अस्सी घाट पर मझोली कोठी में रूम मेट थे, उन्होंने मुझे छोड़ दिया, उस समय, मैं बीएचयू में कानून का छात्र था, भगवान उनकी आत्मा को शांति दे

सूबेदार पांडेय

अध्यक्ष, बक्सर बार काउन्सिल (शुक्ल जी के मित्र)



ओहो!!! बेहद दुःखद! गुरुवर हमें मुक्तिबोध पढ़ाते थे और उसमें भी अंधेरे में और ब्रह्मराक्षस कविता की बेजोड़ ब्याख्या करते थे! मुझ पर गुरुदेव का बहुत स्नेह था...स्तब्ध हूँ... हिंदी विभाग बीएचयू की एक महान विभूति...विनम्र श्रद्धांजलि!!!

आलोक कुमार उपाध्याय

शिष्य



उद्भट विद्वान और स्नेही शुक्ल जी कोशतशः नमन।

डॉ सत्येंद्र सिंह

अध्यापक



श्रद्धेय गुरुवर रामनारायण शुक्ल जी को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि। शिक्षक की गरिमा, सहजता तथा औदात्य से युक्त व्यक्तित्व। वैचारिकी ओढ़कर शिक्षण कर्म से दूरी बनाए रखने वालों से दूर खड़े हिंदी के वरिष्ठ आचार्य हमलोगों के बीच नहीं रहे।

नंदकिशोर पांडेय

शिष्य



आदरणीय गुरुवर प्रोफेसर रामनारायण शुक्ल जी मार्क्सवादी विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध थे। मुक्तिबोध को पढ़ाते समय उनकी इस प्रतिबद्धता की चमक और बढ़ जाती थी। कई बार वे एक अध्यापक के वजूद से अलग, एक चिंतक के रूप में विचारों की सैद्धांतिक ऊर्ध्वगामिता की ओर उन्मुख हो जाते थे। लेकिन यह मानना पड़ेगा कि वे जनवादी गतिविधियों को किसी न किसी रूप में सहयोग देने को हमेशा तत्पर रहते थे। वे डिक्लास होने की बहुत चर्चा करते थे और नकलीपन की भर्त्सना किया करते थे। तब उनके व्यक्तित्व की आभा देखते ही बनती थी। प्रोफेसरी के अहम् से वे भरसक दूरी बनाकर रहते थे और विद्यार्थियों के निकट हो जाते थे। उनका जाना अत्यंत दुखद है। उन्हें विनम्रतापूर्वक नमन!

शिवकुमार पराग

शिष्य



हिंदी विभाग के आत्मीय साथी जनवादी लेखक, प्रखर आलोचक समर्पित ऐक्टिविस्ट भाई रामनारायण शुक्ल भी चले गए। स्तब्द्ध हूँ। आखिरी जोहार साथी.

चौथीराम यादव

पूर्व विभागध्यक्ष, हिंदी विभाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी (प्रसिद्ध आलोचक)



गुरुदेव को सादर नमन व श्रद्धांजलि। 1986 के जनवरी महीने में जब बी एच यू के हिंदी विभाग में उन्हें देखा था तो बिलकुल ही यह महसूस नही हुआ था कि वे इस विभाग के अध्यापक हैं बल्कि ऐसा लगा था कि मेरे घर परिवार का ही कोई सदस्य बी एच यू के हिंदी विभाग में आकर खड़ा हुआ है।

रामचंद्र शुक्ल



सौभाग्य से डॉ शुक्ल जी का सानिध्य कुछ वर्षों तक हमें भी मिला। उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला। सतीश चन्द्र कॉलेज की शिक्षक संघ कार्य-कारिणी में हम सहयोगी भी रहे। उनके निधन से मै आहत हूँ एवं भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ ।

लालबहादुर तिवारी

अध्यापक



वह भी क्या दिन थे, जब मेहनकश का राज्य स्थापित करने पर शुक्ल जी से गरमगरम बहसे होती थी। याद करते हुए विनम्र श्रद्धांजलि।🌹

आनंद कुमार मिश्रा

अध्यापक



डाक्टर रामनारायण शुक्ल जुलाई 1970 में सतीश चन्द्र कालेज, बलिया में स्नातकोत्तर कक्षाओं को संचालित करने की सरकार द्वारा प्राप्त अनुमति के पश्चात हिन्दी विभाग में स्थायी प्रवक्ता पद पर नियुक्त हुए थे। वे काशी हिंदू विश्वविद्यालय में मेरे स्नातक कक्षाओं में सहपाठी थे। उस समय वे बहुत सीधे सादे तथा सामाजिक विसंगतियों से अछूते थे। सन् 1966 में एमए प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने के बाद शोध कार्य मे लग गये। इसी समय उनके जीवन में महान परिवर्तन आया और वे साम्यवादी विचारधारा के कट्टर समर्थक हो गये। सतीश चन्द्र कॉलेज में मेरी उनसे मुलाकात एक नये राम नारायण शुक्ल से हुयी। उनकीं सहजता सरलता एवम् सदा पान का सेवन अभी भी भूला नहीं है। उनका आत्मीय व्यवहार आज भी याद है। डाक्टर पाण्डेय जी, आपने उनके विषय में जानकारी देकर आपने बहुत ही अच्छा कार्य किया है। गतात्मा के प्रति श्रद्धांजलि के साथ-साथ आप को भी बहुत-बहुत धन्यवाद।

बनारसी पटेल

सहपाठी



बहुत सच्ची और सुचिंतित अभिव्यक्ति। हमारी पीढ़ी की रचना में उनका बहुत बड़ा योगदान रहा है। सादर स्मरण- चंद्रकला त्रिपाठी, बलिराज पांडेय की पोस्ट पर। यह मेरा सौभाग्य है कि मुझे शुक्ला सर से पढ़ने का मौका मिला! अपने छात्र जीवन में कटहल के उस पेड़ के नीचे उन्हें घेरकर मंत्रमुग्ध हो सुनने वालों में मैं भी शामिल था। एक ऐसा विद्वान अध्यापक, जो किसी विषय पर घंटो लगातार बोलने की क्षमता रखता हो, दुर्लभ होते हैं। गुरुदेव को सादर नमन।

राजीव कांत

शिष्य



गुरुवर को अश्रुपूर्ण श्रद्धाँजलि। हमारे शिक्षक रहे थे। बी ए में हमलोगों को सामान्य हिन्दी में छोटे नाटक पढ़ाते थे। विषकन्या एकांकी नाटक की अद्भुत व्याख्या थी उनकी। वे पाठन के दौरान विद्यार्थियों से सामाजिक मुद्दों पर उनकी राय जानना चाहते थे। राजाओं को वे ऐय्साश कहते थे। उनके शिक्षण की अपनी विशिष्ट शैली थी। वे समाज के गरीब वर्ग के पक्षधर थे। बाद में हमने भी अपने शिक्षक जीवन में उनके द्वारा दिये गये सामाजिक सरोकार को शिक्षण में अपनाया। उनकी मधुर दिल छूनेवाली मुस्कराहट उनका स्नेह उनका सामान्य व्यक्ति के जीवन से गहरा लगाव और उसमें सुधार करने की भीतरी छटपटाहट बरबस ही याद आ रहे हैं। गुरुदेव को हार्दिक श्रद्धाँजलि। परमेश्वर उनकी पुण्यात्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दे। ॐ शान्तिः ॐ शान्तिः ॐ शान्तिः

राघवेंद्र नारायण

विद्यार्थी



वह सोनभद्र जिले के यानि कि मेरे जिले के थे। एक बार वे मेरे गुरूभाई के फाइनल वाइवा में आए हुए थे। हमको लेकर वह पैदल ही लंका चल दिए। पीछे से सब लोग मेरे हाथ जोड़ रहे थे कि उन्हें रिक्शे पर बैठ जाने दो, लेकिन वह लंका तक सबको लेकर पैदल ही आए। बेहद विनम्र और मृदुभाषी थे। मेरे गुरू के गुरू थे। विनम्र श्रद्धांजलि!

अवनीश चंद्र पांडेय



मेरा परिचय उनसे पहली बार BHU में उनके द्वारा निदेशित नाटक 'एक और द्रोणाचार्य' के अवसर पर हुआ था, जिसमें बड़ी भूमिका उनके बड़े पुत्र, अजय ने निभाई थी। उसके बाद तो मैं उनके घर का एक सदस्य बन गया था। कैम्पस के प्राध्यापक आवास ही सेंटर बन गया था। फिर दिल्ली 'शम्शुल इस्लाम', CLI के उनके संगठनोँ से भी घनिष्ठता बन गई थी। समय बदलते देर नहीं लगती! उनका जाना कितना सदमा भरा!! मैं खुद भी मानसिक-शारीरिक गर्दिशों में जीने की कोशिश कर रहा हूँ। निरा अकेले-अकेले! तुम्हारी 'एक छोटी सी क्यारी' को निरखते हुये!! आभार!

जी पी मिश्रा

अध्यापक



उनकी स्मृतियों को नमन। हम लंबे समय तक उनकी नुक्कड़ नाटक टीम में शामिल रहे, साथ-साथ चले। बलिया के दिन याद आ गए। अध्यापक किस तरह अपने छात्रों का व्यक्तित्व निर्माण करता है, वे इसकी मिसाल थे।- जलेश्वर उपाध्याय अकेले और अनन्य थे प्रोफेसर रामनारायण शुक्ल जी को नमन।

निर्मल कुमारी वार्ष्णेय

प्रोफ़ेसर, हिंदी विभाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी



सर, नब्बे के दशक में अपने विद्यार्थी जीवन मेँ आदरणीय शुक्ल जी के विराट व्यक्तित्व का सामीप्य मैंने भी बहुत निकट से प्राप्त किया है। पुण्यात्मा को सादर नमन।

रामप्रवेश उपाध्याय

छात्र



इसमें दो राय नहीं कि शुक्ल जी एक जोरदार अध्यापक थे और मार्क्सवाद के प्रति पूर्ण समर्पित भी। मार्क्सवाद का उनसे अच्छा प्रचारक मैने नहीं देखा। उनके प्रचार में अद्भुत माधुर्य होता था। जो उस दर्शन के बहुत अनुकूल नहीं था। वह हमारे प्रिय गुरु रहे। उन्हें सादर नमन।

रमाकांत नीलकंठ

छात्र



शुक्ल जी से बलिया में १९७३-७४ में मिलना जुलना रहा। वे सतीश चन्द्र डिग्री कॉलेज में अध्यापक थे। उनके इर्द-गिर्द नौजवानों की टोली हुआ करती थी। उनके साथ बैठकी तथा उन्हें सुनने के कई अवसर मिले। १९७५ के बाद संपर्क टूट सा गया। १९८५ में जब हमलोग जसम के निर्माण की प्रक्रिया में थे, अवधेश प्रधान जी के प्रयास से वे मंच से जुड़े। वे राष्ट्रीय उपाध्यक्ष तथा उप्र इकाई के पहले अध्यक्ष भी बनाये गये। वे प्रखर लेखक, चिन्तक और एक्टिविस्ट थे। 'जन संस्कृति' पत्रिका के लिए भी लिखा। पत्रिका के सलाहकार मंडल में शामिल रहे। उनकी याद को सलाम।

कौशल किशोर

अध्यापक



बलिया से शुरू हुआ परिचय बनारस में कैसे प्रगाढ़ हुआ, प्रेमचंद और मुक्तिबोध के मास्टर, विभाग के सुकरात का विशद परिचय देने के लिए साधु साधु. शुक्ल जी को नमन

कृपाशंकर चौबे

अध्यापक



स्मृति को सादर नमन। वाकई वे सकर्मक बौद्धिक और छात्र वत्सल अध्यापक थे! विनम्र श्रद्धांजलि।

समीर कुमार पाठक

अध्यापक



सादर श्रद्धांजलि। हमारे लिए वे गुरु तो थे ही, उससे भी कहीं ज्यादा सक्रिय साथी, निश्छल मित्र थे। हम सबने उनकी ही अगुवाई में बनारस में जनवादी नुक्कड़ नाटकों की शुरुआत की थी। महीनों सड़कों पर नाटक किए, गाजीपुर के गांवों में गए, पुलिस के दमन झेले, वे हमेशा हमारे साथ डटे रहे कॉमरेड की तरह। पढ़ाई भी, लड़ाई भी यह उनसे सीखा हमने।

जलेश्वर उपाध्याय

छात्र



यह मेरा सौभाग्य है कि मुझे शुक्ल सर से पढ़ने का मौका मिला! एम.ए. के दौरान एक ऐसा विद्वान अध्यापक, जो किसी विषय पर घंटो लगातार बोलने की क्षमता रखता हो, दुर्लभ होते हैं। गुरुदेव को सादर नमन।

रविंद्र कुमार

शिष्य



एक जोरदार अध्यापक और मार्क्सवाद प्रचारक के रूप में उनकी छवि अमिट है। प्रो. रामनारायण शुक्ल हमारे गुरु रहे हैं। वह जनवादी विचारधारा के मूर्तिमान रूप थे।

रमाकांत नीलकंठ

शिष्य



विनम्र श्रद्धांजलि। मैंने भी उनके सानिध्य में सड़क पर नुक्कड़ नाटक किया था।

रमेश चंद्र राय

शिष्य



मैं उनसे कई बार मिला क्योंकि उन्होंने मेरी पत्नी डॉ आरती जी को पढ़ाया था। वह बहुत ही अच्छे इंसान थे। दुखद खबर।

जी पी श्रीवास्तव

शिष्य